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अरावली टूटी तो वन से दूर नहीं

नमस्ते दोस्तों! ???? आज हम बात कर रहे हैं उत्तर भारत की 'Life-Line' यानी अरावली की। अरावली सिर्फ पहाड़ नहीं हैं, यह थार रेगिस्तान को दिल्ली, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में फैलने से रोकने वाली आखिरी दीवार है।

नमस्ते दोस्तों! ????

आज हम बात कर रहे हैं उत्तर भारत की 'Life-Line' यानी अरावली की। अरावली सिर्फ पहाड़ नहीं हैं, यह थार रेगिस्तान को दिल्ली, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में फैलने से रोकने वाली आखिरी दीवार है। अगर अरावली टूटी, तो वन और स्वच्छ हवा हमसे बहुत दूर हो जाएंगे। यहाँ जहाँ आज हम खड़े हैं… यही धरती 1.5 अरब से भी अधिक वर्ष पुरानी है अरावली सिर्फ़ पत्थरों का ढेर नहीं — यह उत्तर भारत की प्राकृतिक ढाल है। यहाँ का हर पेड़, हर घाटी, हर नाला भारत का पर्यावरणीय स्तंभ है।” लेकिन हाल ही में एक बड़ी पटकथा ने इस प्राकृतिक कहानी को एक नए मोड़ पर ला दिया। सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसला सुनाया, जिसने अरावली‑हमारे जीवनदायिनी पहाड़ों को एक नई ‘परिभाषा’ दी…” अब अरावली को केवल उन पहाड़ों और उत्थानों के रूप में माना जाएगा, जिनकी ऊँचाई आसपास के धरातल से कम‑से‑कम 100 मीटर या उससे अधिक है, और जहां दो या अधिक ऐसे पहाड़ एक‑दूसरे से 500 मीटर के भीतर हैं। “इसका मतलब? 90% से ज़्यादा छोटी पहाड़िया — जो असल में पानी संचित करती थीं, जंगलों को बचाती थीं — अब कानूनी संरक्षण से बाहर हो सकती हैं। ये ‘नए‑परिभाषित’ अरावली के बाहर चली जाएँगी और खनन, निर्माण और विकास के लिए खुल सकती हैं।” “और तब शुरू हुआ असली जनआंदोलन — हेश टैग सेव अरावली!” लोग सड़कों पर उतरे — राजस्थान के उदयपुर से जयपुर तक प्रदर्शन हुए, पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव भी हुआ, कुछ को गिरफ़्तार किया गया, तब भी लोग चुप नहीं हुए। सोशल मीडिया पर हेश टैग सेव अरावली ट्रेंड हुआ, जहाँ पर्यावरणविद, नेताओं और आम जनता ने कहा — अरावली सिर्फ़ मीटरों की परिभाषा नहीं, बल्कि हमारी साँसों, पानी और भविष्य की रक्षा करती है। “अरावली कोई कहानी नहीं, जीता‑जागता इतिहास है।" अगर इसे आज बचाया नहीं गया — तो हम कल क्या बचाएँगे? यह लड़ाई केवल पहाड़ों की नहीं — यह हमारी पहचान, हमारी हवा, हमारी ज़मीन और हमारी आने वाली पीढ़ियों का भविष्य है। अरावली बचाओ — इसलिए कि यह भारत की रीढ़ है।